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तन्त्र ने सलामी ली : गण ज़मीन पर ही रहा...............मनोहर चावला वरिष्ठ पत्रकार

 BBT Times, बीकानेर




बीकानेर, 4 फरवरी। सरकार को बदले दो साल हो गए ।अशोक  की जगह भजनलाल मुख्यमंत्री बने हुए है । राम लला अयोध्या में भी आ गये। पूरे देश ने इनको वर्षगाँठ पर उत्साह और जोश खरोश से ख़ुशियाँ मनाई। हमारे बीकानेर में भी कम उल्लास नहीं था। हमने भी घी के दीये जलाये, आतिशबाज़ी की, फिर १४४ साल बाद कुम्भ भी आ गया। करोड़ो लोगो ने डुबकी लगाकर अपने पाप धोए।  सब कुछ अच्छा हो गया।  इसके बाद हमने अब ७७ वा गणतन्त्र दिवस मनाया। दिल्ली में राष्ट्रपति महोदया ने समारोह को संबोधित किया और जयपुर में राज्यपाल ने और हमारे बीकानेर में मंत्री सुमित गोदारा ने झंडारोहण किया। इन सब जगह तन्त्र ने सलामी ली    और  गण ज़मीन पर ही रहा।  सवाल फिर आकर खड़ा हो गया कि आख़िर आम आदमी को राहत कब मिलेगी। बीकानेर का सुधार कौन करेगा ? मोदी जी  ! जिन्होंने जेठानन्द व्यास के लिए वोट माँगे थे। उन्हें हमने जिता भी दिया ।वह सक्रिय भी है  लेकिन उनकी आगे चल नहीं रही। सिद्धि कुमारी को हमने कई सालों से देख रखा हैं।वह वही की वही है। बस वोट लेना उसके बाद जनता से क्या लेना! केन्द्रीय मन्त्री अर्जुन मेघवाल को हम देख ही रहे हैं। हाई- कोर्ट की बेंच वो आज तक ला नहीं सके। यू जी सी के नियमों में परिवर्तन करवा के सवर्ण लोगो में जरूर नाराजगी बढ़ा दी गई है । रेलवे फाटको की समस्या का समाधान वो करवा नहीं सके  लेकिन हवाई अड्डे को जयपुर जैसा बनाने की जरूर उनकी योजना हैं। छह विधायक देने के बावजूद भी एक लूणकरनसर के विधायक सुमित गोदारा को मन्त्री बनाया गया हैं वो अपने क्षेत्र या गाँवो की सुध- खबर बहुत अच्छी तरह लें रहे है इसमें कोई शक नहीं। लेकिन  हमारे शहर बीकानेर की सुध ख़बर कौन लेगा ? वैसें बीकानेर के लोगो की कोई बहुत ज़ायदा अपेक्षायें नहीं है। वो सिर्फ़ चाहते हैं कि उनका शहर भी जोधपुर, जयपुर , कोटा, अजमेर, उदयपुर की तरह साफ़ सुथरा और सुन्दर बने। उस जैसा विकास यहाँ भी हो। राजनेताओं की कमज़ोरी के कारण यहाँ न तो रेल फाटको की समस्या का निदान होता हैं न ही सीवरेज सिस्टम लागू होता हैं। सट्टा बाज़ार काफ़ी दिनों तक सीवरेज चोक होने से कीचड़ से सनसनाता रहा। वो हमने सबने देखा ही है। पूरा शहर उधड़ी सड़को से ग्रस्त है। आए दिन लोग टूटी सड़को के कारण दुर्घटनाओं का शिकार होते है न यहाँ सड़के बनती है न यहाँ सिटी बस चलती है। सूचना केन्द्र यहाँ डाक बंगले में चलता हैं। वो भी ऊपर की मंजिल पर, जहाँ सीनियर सिटीजन सीढ़िया चढ़कर वाचनालय पुस्कालय का लाभ ले नहीं सकते ।पार्को का यहाँ विकास नहीं होता। हमारे ज़ू का कहीं अता- पता नहीं। ड्राईपोर्ट की घोषणा हवा में उड़ गई। कितने करोड़ो रुपैये खाकर भी सुरसागर की समस्या ज्यो की त्यौ हैं। शहर के सबसे बड़े अस्पताल की अव्यवस्था किसी से छिपी नहीं हैं। कोई बड़ा डाक्टर अपनी सीट पर नहीं मिलता। रेज़िडेंट डाक्टरों के भरोसे यह अस्पताल चल रहा हैं। बड़े डाक्टरों को अपनी प्राइवेट प्रेटिक्स से फ़ुरसत नहीं। अब तो उन्होंने अपने घर में ही दवा की दुकाने और लेबोरिटी खोल रखी है। वैसे भी गली- गली में कमीशनवाली पैथोलॉजि की दुकाने खुल गई है। जहाँ अनजान और अनपढ़ लेबोरेटरी मेन  मरीजों के खून, पेशाब, या अन्य रोगों की गलत जाँच करते है। और डाक्टर कमीशन के बल पर उनका इलाज। यही हाल मिलावटखोरों का हैं कोई चीज यहाँ शुद्ध नहीं मिलती। दूध, घी, तेल मिर्च, मसाले, नमकीन, मिठाई अब असली कही नहीं मिलती। सम्बन्धित सभी लोगो के महीने बंधे हैं। शहर की बिगड़ती यातायात व्यवस्था की क्या बात करे। आम आदमी का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया हैं। चारों तरफ़ अतिक्रमण ही अतिक्रमण है घरों में दुकाने खुल गई है। आवासीय कालोनिया बाज़ारो में तब्दील हो गई है ।सड़के ,कारों की पार्किंग से संकरी हो गई है। अब यहाँ जंगलराज की याद आती हैं। सड़को को व्यापारियों और गाड़े वालो ने भी घेर रखा हैं। टेम्पो और थ्री- व्हिलर वालो ने अपनी लहराती चालो से सड़क पर आम आदमी का चलना दुशवार कर रखा हैं। पुलिस सिर्फ़ हेलमेट चेकिंग में मशगूल हैं। उधर चोरिया निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। पूर्व में सम्भागीय आयुक्त  नीरज के पवन आये थे उन्होंने यातायात व्यवस्था कुछ सुधारी थी लेकिन नेताओ को अपने वोटो की चिन्ता से उनकी कार्यप्रणाली नागवार गुजरी थी  और उनका ट्रांसफ़र करा दिया। हम फिर वही के वही आ गये है । आप शहर में पैदल नहीं चल सकते। जीवन दुश्वार हो गया है अब तो लोगो को यही इन्तज़ार हैं कि कोई मसीहा आयेगा  जो  बीकानेर के गौरव को लोटाएगा और बीकानेर को एक नया स्वरूप देगा।  फिलहाल तो खेजड़ी के पेड़ कटते  रहेंगे और उन्हें रोकने के लिए महापड़ाव लगते रहेंगे। लेकिन जनता को भी अब कुछ करने  को  सोचना होगा , जागरूक होना होगा । हमने तो ५६ साल तक नगर की समस्यों के बारे सरकार और प्रशासन को हमेशा आईना दिखाया है लेकिन प्रशासन है कि देखना ही नहीं चाहता। अब हम सिर्फ़ जनता से ही गुहार कर सकते है कि वो जागे! अपने हक़- हकूक़ के लिए संघर्ष करे। अंत में कवि दुष्यंत के शब्दों में —— हो गई है पीर पर्वत सी- अब तो पिघलनी चाहिए। 

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